वरिष्ठ आलोचक शंभुनाथ की आलोचना का सैद्धांतिक विवेचन करते समय सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि उनकी आलोचना किसी एक स्थापित या रूढ़ आलोचनात्मक पद्धति का यांत्रिक अनुकरण नहीं है। वह अनेक बौद्धिक परंपराओं—मार्क्सवादी विचार, सांस्कृतिक अध्ययन, इतिहास-बोध और आधुनिकतावादी चेतना—के सतत संवाद से निर्मित एक जीवंत, बहुआयामी और हस्तक्षेपकारी आलोचनात्मक दृष्टि है।
शंभुनाथ की आलोचना का मूल आग्रह साहित्य को उसके सामाजिक, ऐतिहासिक और वैचारिक संदर्भों से पृथक कर देखने के विरुद्ध है। उनके लिए साहित्य किसी स्वायत्त सौंदर्यात्मक वस्तु का रूप नहीं, बल्कि समाज की जटिल संरचनाओं में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करने वाली वैचारिक और सांस्कृतिक क्रिया है।
उनकी आलोचनात्मक दृष्टि की व्यापकता और वैचारिक सृजनशीलता का परिचय उनकी प्रमुख कृतियों से मिलता है—संस्कृति की उत्तरकथा (2000), धर्म का दुखान्त (2000), दुस्समय में साहित्य (2002), हिन्दी नवजागरण और संस्कृति (2004), सभ्यता से संवाद (2008), रामविलास शर्मा (2011), भारतीय अस्मिता और हिन्दी (2012), कवि की नई दुनिया (2012), राष्ट्रीय पुनर्जागरण और रामविलास शर्मा (2013), उपनिवेशवाद और हिंदी आलोचना (2014) तथा प्रेमचन्द का हिन्दुस्तान: साम्राज्य से राष्ट्र (2014)।
इन कृतियों में शंभुनाथ न केवल साहित्यिक परिघटनाओं का विश्लेषण करते हैं, बल्कि भारतीय समाज की ऐतिहासिक यात्रा, वैचारिक संघर्षों और सांस्कृतिक अंतर्विरोधों को भी आलोचना के केंद्र में लाते हैं।
इसी क्रम में उनकी संपादित पुस्तकों—जातिवाद और रंगभेद (1990), गणेश शंकर विद्यार्थी और हिंदी पत्रकारिता (1991), राहुल सांकृत्यायन (1993), आधुनिकता की पुनर्व्याख्या (2000), सामाजिक क्रांति के दस्तावेज (दो खंड, 2004), 1857, नवजागरण और भारतीय भाषाएँ (2007), भारतेन्दु और भारतीय नवजागरण (2009), संस्कृति का प्रश्न: एशियाई परिदृश्य (2011), हिंदी पत्राकारिता: हमारी विरासत (दो खंड, 2012), शब्द का संसार (2012), हिन्दी नवजागरण: बंगीय विरासत (दो खंड), प्रसाद और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन (2013) तथा हिंदी साहित्य ज्ञानकोश (सात खंड, 2019)—से यह स्पष्ट होता है कि उनकी आलोचना केवल साहित्यिक विवेचन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह इतिहास, राजनीति, संस्कृति और भाषा के अंतर्संबंधों की गहरी पड़ताल करती है।
सैद्धांतिक स्तर पर शंभुनाथ की आलोचना का सबसे स्पष्ट आधार ऐतिहासिक भौतिकवाद है, किंतु यह पारंपरिक या रूढ़ मार्क्सवादी आलोचना नहीं है। वे वर्ग-संघर्ष, उत्पादन संबंधों और सत्ता-संरचनाओं को साहित्यिक विश्लेषण के लिए अनिवार्य मानते हैं, पर किसी रचना को केवल ‘वर्गीय प्रतिनिधित्व’ में सीमित नहीं करते। उनकी आलोचना में इतिहास एक जड़ या बाह्य संदर्भ न होकर एक जीवित प्रक्रिया की तरह उपस्थित रहता है—ऐसा इतिहास जो साहित्यिक रूपों, शैलियों और भाषिक संरचनाओं के भीतर अंतर्निहित होता है।
इसीलिए वे रचना के कथ्य के साथ-साथ उसके रूप, भाषा और शिल्प को भी वैचारिक अर्थवत्ता से युक्त मानते हैं।
शंभुनाथ की आलोचना का एक महत्त्वपूर्ण सैद्धांतिक पक्ष उनकी आधुनिकता-संबंधी समझ है। वे आधुनिकता को केवल एक कालखंड या पश्चिम से आयातित विचार के रूप में नहीं देखते, बल्कि भारतीय समाज में उसके असमान, द्वंद्वात्मक और संघर्षपूर्ण विकास के रूप में समझते हैं। उनकी दृष्टि में हिंदी साहित्य की आधुनिकता अधूरी, खंडित और अंतर्विरोधों से भरी हुई है, और आलोचना का कार्य इन्हीं अंतर्विरोधों को उद्घाटित करना है।
इस संदर्भ में वे प्रगतिवाद, नई कविता और उत्तर-आधुनिक प्रवृत्तियों—सभी का परीक्षण आलोचनात्मक दूरी के साथ करते हैं। वे किसी भी साहित्यिक आंदोलन के प्रति अंध-समर्थन के बजाय उसके ऐतिहासिक योगदान और वैचारिक सीमाओं, दोनों को रेखांकित करते हैं।
सत्ता और विचारधारा का प्रश्न शंभुनाथ की आलोचना के केंद्र में है। वे मानते हैं कि साहित्य कभी निरपेक्ष नहीं होता; वह या तो सत्ता संरचनाओं का मौन समर्थन करता है या उनके विरुद्ध प्रतिरोध की भाषा गढ़ता है। इसीलिए उनकी आलोचना में राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता, बाज़ारवाद और नवउदारवादी संस्कृति की तीखी और गहन पड़ताल मिलती है।
वे साहित्यिक पाठ को विचारधारात्मक संघर्ष के क्षेत्र के रूप में देखते हैं, जहाँ भाषा स्वयं एक राजनीतिक उपकरण बन जाती है। उनकी आलोचना यह दिखाने का प्रयास करती है कि किस प्रकार कुछ रचनाएँ यथास्थिति को स्वाभाविक और अपरिहार्य बनाती हैं, जबकि कुछ रचनाएँ उसी ‘स्वाभाविकता’ को प्रश्नांकित करती हैं।
शंभुनाथ की आलोचना का एक अन्य सैद्धांतिक आयाम सांस्कृतिक आलोचना से जुड़ा है। वे साहित्य को व्यापक सांस्कृतिक उत्पादन—मीडिया, लोकप्रिय संस्कृति, राजनीति और उपभोक्तावादी प्रवृत्तियों—के साथ जोड़कर देखते हैं। इस दृष्टि से उनकी आलोचना केवल ‘उच्च साहित्य’ तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समकालीन सांस्कृतिक संरचनाओं की वैचारिक आलोचना में रूपांतरित हो जाती है।
यही कारण है कि उनकी आलोचना पारंपरिक साहित्यिक आलोचकों से अलग एक व्यापक सामाजिक-बौद्धिक हस्तक्षेप का रूप ग्रहण करती है।
भाषा और शैली के स्तर पर भी शंभुनाथ की आलोचना का सैद्धांतिक स्वरूप विशिष्ट है। उनकी भाषा अकादमिक होते हुए भी निर्जीव नहीं है; उसमें वैचारिक तीखापन, ऐतिहासिक गहराई और राजनीतिक स्पष्टता विद्यमान है। वे आलोचना को तटस्थ विवरण नहीं, बल्कि एक सचेत बौद्धिक हस्तक्षेप मानते हैं।
इसीलिए उनकी आलोचना में स्पष्ट निर्णयात्मकता दिखाई देती है—वे यह कहने से नहीं हिचकते कि कौन-सी प्रवृत्तियाँ साहित्य को वैचारिक रूप से सक्रिय और जीवंत बनाती हैं और कौन-सी उसे निष्क्रिय एवं ऐपोलिटिसाइज़ करती हैं।
समग्र रूप से देखा जाए तो शंभुनाथ की आलोचना साहित्य को समाज से काटने के बजाय समाज के भीतर गहराई से स्थापित करती है। उनकी आलोचना का केंद्रीय उद्देश्य साहित्य के माध्यम से विचारधारात्मक स्पष्टता, ऐतिहासिक चेतना और प्रतिरोध की संभावनाओं को उजागर करना है। इस अर्थ में शंभुनाथ की आलोचना केवल साहित्यिक मूल्यांकन नहीं, बल्कि समकालीन समय की एक सशक्त, सचेत और राजनीतिक रूप से हस्तक्षेपकारी बौद्धिक परियोजना है।
(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)